मोहल्ला अस्सी : धार्मिक पाखण्ड और वैश्वीकरण

कल सनी देओल की मोहल्ला अस्सी देखी, कोर्ट ने इस फिल्म की रिलीज़ पर स्टे लगा दिया है और कुछ धार्मिक पाखंडी इस फिल्म को रिलीज़ नहीं होने देंगे ऐसा मेरा विश्वास है, इसलिए मैंने ऑनलाइन लीक हुआ प्रिंट ही देखा है.

बहरहाल मैं कोई फिल्म समीक्षक नहीं हूँ पर कुछ बातें फिर भी आपके साथ साझा करना चाहूंगा, यह फिल्म काशीनाथ सिंह के उपन्यास “काशी का अस्सी” पर आधारित है जो 2004 में प्रकाशित हुआ था. आजकल यह देखा गया है की हिन्दू देवी देवताओ का फिल्मो में मज़ाक बनाया जाता है जैसा का आमिर की फिल्म में था लेकिन मेरे अनुसार इस फिल्म में कहीं भी शिव जी का मज़ाक नहीं बनाया गया अपितु सनी देओल की शिवभक्ति देखने लायक है

मोहल्ला अस्सी की कहानी में नयापन है और यह फिल्म आजकल की डबल मीनिंग और बे सर पैर की फिल्मो से काफी अलग है, जिन चीज़ो को लेकर इतना बबाल मचा है अगर आप फिल्म देखे तो पता चलेगा की वह संवाद और दृश्य जबरन पब्लिसिटी पाने के लिए ठूसे हुए नहीं है अपितु कहानी का अभिन्न अंग हैं.

कहानी अस्सी घाट के पंडितों पर आधारित है और यह बताती है की किस प्रकार हम भारतीय विदेशी संस्कृति और विदेशी लोगो का अनुसरण कर रहे है, पैसा कमाने की होड़ में हमने अपने भारतीय मूल्यों को हाशिये पर डाल दिया है. ग्लोबलाइजेशन के क्या दुष्परिणाम भारत पर पड़े है. अगर आप आज का भारतीय परिवेश देखे तो यह स्थिति आज आम है, एकल परिवार, पति पत्नी दोनों सुबह से शाम कमाने जा रहे है और उनके बच्चे माता पिता और बड़ो के अभाव में नशे में लिप्त पाएं जातें है. यही आज का भारत है और यह ग्लोबलाइजेशन का ज़हर है जिसकी आज की युवा पीड़ी आदि हो गयी है.

खैर ऐसे माहोल में सनी देओल जो एक सच्चे पंडित बचे है काशी में, अपना गुज़र बसर कर रहे है जैसे तैसे क्योंकि उन्होंने अपनी धार्मिकता से समझौता नहीं किया है. फिल्म में दिखाया है कैसे सनी देओल अपनी साथी पंडितो से पिछड़ जाते है और पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा नहीं पाते है, बीवी को सोना नहीं दिला पाते, बच्चो को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते और अकेले ही घुटते रहते है, वाकई उन्होंने एक पिता, पति और धार्मिक पंडित का अभिनय ज़बरदस्त किया है, एक हारे हुए आदमी के दर्द को बखूबी जिया है, बाकी आप फिल्म देखिये तभी असली मज़ा है.

जिस गाली का प्रयोग फिल्म में बहुत बार हुआ है वह कहीं भी अनुचित नहीं लगती, मैं यहां ढकोसलों की बात नहीं करूँगा लेकिन जो सच्चाई है वही इस फिल्म में दिखाई गयी है और वह कहीं भी ठूंसी हुई नहीं लगती।

अंत में यही कहूँगा काफी लम्बे अरसे बाद कोई विशुद्ध भारतीय फिल्म देखि है जो सोचने पर मजबूर करती है, लगता है फिल्म नहीं हक़ीक़त देख रहे है, मुझे पता है अगर फिल्म लगी भी तो नहीं चलेगी क्योंकि आजकल दर्शकों को खान बंधुओ की बेसिर पैर के बकवास ही अच्छी लगती है, लेकिन मेरी तरफ से फिल्म वाकई “हटकर” हैं.

धन्यवाद डॉक्टर चंद्रप्रकाश दिवेदी और सनी देओल, इतनी बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए.

Comments