मदारी : आम आदमी का डमरू और बंदरों का तमाशा

KishanH January 9, 2017
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madaari मदारी

IMDB पर बॉलीवुड की 2016 की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में इरफ़ान खान की मदारी को अव्वल पाया तो देर से ही सही, इसे देखा। देखकर लगा कि बॉलीवुड में अभी भी कुछ लोग अच्छी और विचारणीय फिल्में बना रहे है. मदारी पूरी तरह से इरफ़ान खान के कन्धों पर ही टिकी है और वह बाकी खान कलाकारों से कहीं ज़्यादा मंझे हुए अभिनेता है. लेकिन अजब गज़ब भारतीय दर्शक फूहड़ और बेसिरपैर की फिल्मों के साथ ही करोड़ क्लब तमाशे का हिस्सा बनना पसंद करता है.

बहरहाल फिल्म कुछ यूँ है कि इरफ़ान एक आम आदमी है और जब उनकी ज़िन्दगी का इकलौता मकसद, उनका बेटा एक हादसे में मारा जाता है तो इरफ़ान हादसे के जिम्मेदार लोगो को सजा देने वाला मदारी बन जाता है. इस फिल्म को देखकर यही पता चला कि अगर इस दुनिया में सबसे खतरनाक कोई है तो वह है एक अदना सा आम आदमी जिसके पास खोने को कुछ ना बचा हो. शक्ति से परिपूर्ण नेता और सत्तावादी लोग असल में निहायत ही डरपोक और अशक्त हैं.

निशिकांत कामत उम्दा निर्देशक है और उनका निर्देशन कसा हुआ है. इरफ़ान खान के अलावा जिम्मी शेरगिल ने भी अपनी भूमिका का बेहतरीन निर्वाह किया है. छोटे बच्चे और बाकी सभी कलाकार भी अपना अभिनय सही से निभा गए है लेकिन असल में इस फिल्म की आत्मा इरफ़ान खान ही हैं. आज के कलाकार अभिनय क्षेत्र में आने से पहले जिम जाकर मांसलता मज़बूत करते है, नृत्य में पारंगत होते है, घुड़सवारी, तैराकी इत्यादि सारे जतन करते है बस अभिनय को हाशिये पर फेंक दिया जाता है. मान्यता है कि अभिनय का कोई शास्त्र नहीं है, यह सीखा नहीं जा सकता वरन आपके जीवन के कठोर अनुभव ही आपको इस कला में दक्ष करते है और इरफ़ान खान इसी कारखाने के उत्पाद हैं।

आज के युवा को किसी मदारी और ज्वलंत हक़ीक़त से ज़्यादा दिल की मुश्किल और अपनी बेफिक्री की ज़्यादा फ़िक्र है.  तभी उन फूहड़ फिल्मो की टकसाल निरंतर जारी है. इन्ही दकियानूसी प्रेम कहानियों पर युवा वर्ग फ़िदा होता है और यह बेफिक्रे हकीकत के धरातल से परे ख्वावों की छदम दुनिया में हिलोरे मारता है.

यह फिल्म वास्तव में विशुद्ध भारतीय है जो सत्ता के घिनोने चेहरे को बेनक़ाब करती है, गोयाकि मुख्यमंत्री कहता है कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार सरकार के लिए नहीं है अपितु भ्रष्टाचार के लिए ही सरकार है. भारतीय अवाम ने अपनी आँखें मूँद रखी है और चुपचाप सहता जा रहा है, इस आज़ादी की हालात का और स्वतंत्रता के लिए कुर्बान हुए रणबांकुरो के बलिदान पर अफ़सोस होता है.

एक व्यंग के साथ समाप्ति कि :
कुछ सनी लियॉन के झटकों पे मर गए, कुछ दीपिका की अदाओं पे मर गए, कुछ सलमान की नौटंकी पे मर गए,
भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस भी सोचते होंगे, हम किन कम्बख्तों के लिए मर गए.

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KishanH

मौजूद परिस्तिथियों का प्रभाव, आस पास से मिली प्रेरणा या फिर ऐसे ही विचारों के भंवर में गोते लगाकर, जो मन में आता है यहां लिख देता हूँ, धन्यवाद।