फ़िल्मी प्रेम कहानिया और बूचडखाने

प्रेम, यह एक ऐसा भाव है जिसको परिभाषित करना बड़ा मुश्किल है. समस्त फिल्म जगत चाहे वह बॉलीवुड हो या हॉलीवुड इसी भाव को टकसाल ही तरह प्रयोग करता है, खासकर बॉलीवुड। बिना प्रेम बॉलीवुड में फिल्म बनाने का दुस्साहस चंद लोग ही करते है, जेम्स कैमरॉन की महान फिल्म टाइटैनिक एक त्रासदी कथा कम और प्रेम कथा ज़्यादा थी. सनी देओल की ग़दर में भी भारत पाकिस्तान विभाजन और प्रेम कथा दोनों को समान प्राथमिकता दी गयी थी.

1993 में किंग कोंग की पटकथा में कहीं वनमानुष और लड़की का प्रेम प्रसंग नहीं था परन्तु निर्माता को ज्ञात था कि यह एक महान प्रेम कथा हो सकती है इसलिए उसने ऐसा प्रसंग फिल्म में डलवाया, और किंग कोंग ने सफलता के कीर्तिमान बनाये, उसके बाद किंग कोंग को कई बार दुबारा बनाया गया और 2005 में पीटर जैक्सन की किंग कोंग में डायनासौर्स को भी समाहित किया गया परन्तु प्रेम का भाव वही रहा. फिल्म के अंत में किंग कोंग की मृत्यु का दृश्य मजनू, फरहाद और रोम्यो से ज्यादा हृदय विदायक बन पड़ा था. मृत किंग कोंग में उसकी आँख के नीचे आंसुओं की कड़ी है को कुछ आद्रता लिए सूख गए है. अंत में कुछ हवाई फौजी जश्न के अंदाज़ में अपने आप को महिमामंडित करते हुए कहते है “आखिर हमने विशाल दानव को मार दिया ” तो प्रत्युतर में जैक ब्लैक कहते है की Beauty Kill the Beast, जालिम की जान हसीना ने ले ली. कुछ दर्शको को कोंग और लड़की का प्रेम अजीब लगा, उनका कहना था कि यह कैसे हो सकता है, गोयाकि उनके कथन के पीछे शारीरिकता का भाव था.

आजकल हमारे बॉलीवुड में प्रेम दृश्य प्राय शारीरिकता और मांसलता के दलदल में धंस जाते है और फ़िल्मी प्रेम कहानिया बूचडखाने में बदल जाती है. बूचडखाने में कटी हुई बकरियां लोहे के हुक पर टंगी रहती है और कलेजी महंगे दामो में बिकती है. बहुत ही अजीब बात है कि बकरी के शरीर का हर हिस्सा बेचा जाता है वरन उसके हर अंग की उपयोगिता है जो किसी भूखे की उदरपूर्ति करती है और कुछ हिस्से कुत्ते और दुसरे जीवो की उदरपूर्ति भी करते है, केवल मनुष्य देह की कोई उपयोगिता नहीं है, इसे या तो पंचतत्व में विलीन होना है या जमीन्दोख होना है और हम ताउम्र इसी देह पर इतराते है और इसे सवारने में लगे रहते है।  टीवी नामक बुद्धू बक्से में विज्ञापन जगत के मायाजाल में भी शारीरक सुडोलता और सौंदर्य प्रसाधनो का ही राज है.

बहरहाल मैं कोई प्रेम विश्लेषक नहीं हूँ  पर शायद प्रेम देने का भाव है जिसमे दुसरे की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी का आभास होता है फिर चाहे वो हमारे माता पिता हो, पत्नी हो, भाई हो या फिर हमारे बच्चे हो. दुर्भाग्यवश फिल्म जगत ने प्रेम की परिभाषा के खिलाफ एक षड़यंत्र किया है और युवा के लिए प्रेम का अर्थ बदल गया है.

आपने सुझाव आमंत्रित है, धन्यवाद।

Comments