आजादी का श्रेय और गांधी के आंदोलन

माना गांधी ने कष्ट सहे थे, अपनी पूरी निष्ठा से ।
और भारत प्रख्यात हुआ है, उनकी अमर प्रतिष्ठा से ॥

किन्तु अहिंसा सत्य कभी, अपनों पर ही ठन जाता है ।
घी और शहद अमृत हैं पर, मिलकर के विष बन जाता है।

अपने सारे निर्णय हम पर, थोप रहे थे गांधी जी ।
तुष्टिकरण के खूनी खंजर, घोंप रहे थे गांधी जी ॥

महाक्रांति का हर नायक तो, उनके लिए खिलौना था ।
उनके हठ के आगे, जम्बूदीप भी बौना था ॥

इसीलिये भारत अखण्ड, अखण्ड भारत का दौर गया ।
भारत से पंजाब, सिंध, रावलपिंडी,लाहौर गया ॥

तब जाकर के सफल हुए, जालिम जिन्ना के मंसूबे ।
गांधी जी अपनी जिद में, पूरे भारत को ले डूबे ॥

भारत के इतिहासकार, थे चाटुकार दरबारों में ।
अपना सब कुछ बेच चुके थे, नेहरू के परिवारों में ॥

भारत का सच लिख पाना, था उनके बस की बात नहीं ।
वैसे भी सूरज को लिख पाना, जुगनू की औकात नहीं ॥

आजादी का श्रेय नहीं है, गांधी के आंदोलन को ।
इन यज्ञों का हव्य बनाया, शेखर ने पिस्टल गन को ॥

जो जिन्ना जैसे राक्षस से, मिलने जुलने जाते थे ।
जिनके कपड़े लन्दन, पेरिस, दुबई में धुलने जाते थे ॥

कायरता का नशा दिया है, गांधी के पैमाने ने ।
भारत को बर्बाद किया, नेहरू के राजघराने ने ॥

हिन्दू अरमानों की जलती, एक चिता थे गांधी जी ।
कौरव का साथ निभाने वाले, भीष्म पिता थे गांधी जी ॥

अपनी शर्तों पर इरविन तक, को भी झुकवा सकते थे ।
भगत सिंह की फांसी को, दो पल में रुकवा सकते थे ।।

मन्दिर में पढ़कर कुरान, वो विश्व विजेता बने रहे ।
ऐसा करके मुस्लिम जन, मानस के नेता बने रहे ॥

एक नवल गौरव गढ़ने की, हिम्मत तो करते बापू ।
मस्जिद में गीता पढ़ने की, हिम्मत तो करते बापू ॥

रेलों में, हिन्दू काट-काट कर, भेज रहे थे पाकिस्तानी ।
टोपी के लिए दुखी थे वे, पर चोटी की एक नहीं मानी ॥

मानों फूलों के प्रति ममता, खतम हो गई माली में ।
गांधी जी दंगों में बैठे थे, छिपकर नोवा खाली में ॥

तीन दिवस में श्री राम का, धीरज संयम टूट गया ।
सौवीं गाली सुन, कान्हा का चक्र हाथ से छूट गया ॥

गांधी जी की पाक, परस्ती पर जब भारत लाचार हुआ ।
तब जाकर नाथू, बापू वध को मज़बूर हुआ ॥

गये सभा में गांधी जी, करने अंतिम प्रणाम ।
ऐसी गोली मारी गांधी को, याद आ गए श्री राम ॥

मूक अहिंसा के कारण ही भारत का आँचल फट जाता ।
गांधी जीवित होते तो फिर देश, दुबारा बंट जाता ॥

थक गए हैं हम प्रखर सत्य की अर्थी को ढोते ढोते ।
कितना अच्छा होता जो नेता जी राष्ट्रपिता होते ॥

नाथू को फाँसी लटकाकर, गांधी जो को न्याय मिला ।
और मेरी भारत माँ को बंटवारे का अध्याय मिला ॥

लेकिन जब भी कोई भीष्म कौरव का साथ निभाएगा ।
तब तब कोई अर्जुन रण में उन पर तीर चलाएगा ॥

अगर गोडसे की गोली उतरी ना होती सीने में ।
तो हर हिन्दू पढ़ता नमाज , फिर मक्का और मदीने में ॥

भारत की बिखरी भूमि अब तलक समाहित नहीं हुई ।
नाथू की रखी अस्थि अब तलक प्रवाहित नहीं हुई ॥

इससे पहले अस्थिकलश को सिंधु सागर की लहरें सींचे ।
पूरा पाक समाहित कर लो इस भगवा झंडे के नीचें ॥

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