असहिष्णुता पर बेबाक : मान गए अनुपम सर

जब से मोदी जी की सरकार आई है तब से कांग्रेस और बाकी सभी पार्टीज, मीडिया रखैलों के साथ मिलकर पलटवार कर रहें है, कोई शक नहीं कि मीडिया और पोलिटिकल पार्टीज का सही में कोई ईमान धरम नहीं है. पुरानी कहावत के सन्दर्भ में कि “बन्दर कभी गुलाटी मारना नहीं भूलता” और “कुत्ते ही पूँछ कभी सीधी नहीं होती”, आजकल एक नया खेल चलाया जा रहा है जिसका नाम है “intolerance” मतलब असहिष्णुता, जिसके आयोजक है वही, जो दशकों से भारत को लूटते आयें हैं. असहिष्णुता पर काफी लोगो ने अपना समर्थन दिया, अवार्ड वापसी की नौटंकियाँ भी आयोजित की गयी जिसमे काफी रसूखदारों ने हिस्सा लिया, गोयाकि पूरा भारत एक मदारी के तमाशे सा प्रतीत होने लगा. दुःख की बात है की आमिर खान जैसा मंझा कलाकार भी इस भुलावे में आ गया और उसी पेड़ को काटने का दुस्साहस कर बैठा जिस पर वो बैठा है, उसकी सजा भारत की अवाम ने उसे दे दी है और आमिर शायद ही अब ऐसी भूल करे.

हाल में मैं एक नया नियोजित तमाशा जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में रचा गया है जिसका मंचन अभी भी जारी है, मेरे ख्याल से उस झंडू का पूर्णतया खतना कर देना चाहिए और हाथ पाँव तोड़कर सड़क पर भीख मांगने छोड़ देना चाहिए तब शायद वो यह नारा न दे “अफसल हम शर्मिंदा है क्योकि तेरे कातिल अभी जिंदा है”, इसकी जगह “अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा” हो जाएगा।

खैर, इन सबके विरोध में श्रीमान अनुपम खेर जी ने शनिवार रात टेलीग्राफ नेशनल में एक दमदार भाषण दिया और सभी की बोलती बंद कर दी, वाकई मज़ा आ गया देखकर, पेश है उसी भाषण का विडियो।

सबके अपने तर्क और सोचने का अलग अलग तरीका होता है, मैं इस भाषण से खासा प्रभावित हुआ इसलिए सोचा शेयर करना तो बनता है, आप क्या सोचते है अपनी राय व्यक्त करें।

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