56 इंच का सीना और आवाम फ़िक्रमंदी का तमाशा

भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने 8 नवम्बर 2016 को एक ऐतेहासिक फैसला लेते हुए कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में रूपए 500 और 1000 के नोटों को शहीद का दर्ज़ा दिया, यह उनके लिए पैरों तले जमीन खिसकने जो नोटों के गद्दे बिछाकर सोते थे और बेईमानी की सिगड़ी पर अपनी रोटियां सेंक रहे थे।

आम आदमी ने इस फैसले का खुले दिल से स्वागत किया है परंतु कुछ लोगों ने अपनी सहूलियत में आयी परेशानियों का हवाला देते हुए इस फैसले का विरोध किया है। भारतीय आवाम भी अजब ग़ज़ब है, सहूलियत की चादर में उपदेश के पिटारे खोलते हैं और चादर लेश मात्र खिंचते ही अपने टुच्चेपन पर आ जाते हैं, गोयाकि नक़ाब के पीछे कितने चेहरे छुपा रखें हैं हमें ख़ुद भी इल्म नहीं, सहूलियत से चेहरा बदल कहीं कोई पहचान ना ले भीड़ में।

बहरहाल तमाम विपक्षी पार्टीज़ और मीडिया वैश्या को यकायक आम आदमी की फ़िक्र होने लगी है सभी एक ही जुमला ठेल रहे कि आम आदमी का दुःख देखा नहीं जा रहा, इतने सालों से जब पैसे खा रहे थे तब आम आदमी का ख्याल नहीं आया, अभी अचानक से आम आदमी की इतनी फ़िक्र हो गयी.

कज़रू पप्पू समेत बाक़ी सभी दलों ने आम आदमी की आड़ में मोदी के साहसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना जारी कर दिया है और यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी इसमें कोई दोराय नहीं। बंदूक़ विपक्षियों के हाथ में है लेकिन कंधा आम आदमी का है, इस पूरी प्रक्रिया में बेचारे आम आदमी का शोषण हो रहा है।

मदारी के डमरु बजाने पर बंदरों ने जनता का मनोरंजन शुरू कर दिया है, आवाम से अपील है धेर्य और संयम से तमाशे का आनंद लें। काफ़ी समय बाद देश को साहसी लीडर मिला है, हमें उनका साथ देना चाहिए, शहीद भगत सिंह ने देश की ख़ातिर शहादत की डगर चुनी, हम बैंक की डगर तो जा ही सकते हैं। बॉर्डर पर हमारे वीरों को गोली के बदले गोली मिलती है हमें तो नोट के बदले नोट मिल रहे है। उजले सवेरे से पहले अंधियारा घना होता है, यह पल भी बीत जाएगा।

अंत में यही कहूंगा कि तमाम विपक्षी पार्टीज़ और मीडिया वैश्या को चुल्लू भर पानी में डूब मरने का भी कोई हक़ नहीं, पानी ने क्या बिगाड़ा है.

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